कोयले की व्यथा

January 18, 2013 2:35 pm

मैं कोयला हूँ। मैं  प्रकर्ति का वो अनोखा रूप हूँ जिसे उसने सेकड़ो साल अपने गर्भ में संजो के रखा। में वो पुत्र हूँ जो अब अपनी माँ के  विनाश का सबसे बडा कारण बन गया है।

उद्योगिक क्रांति ने ना सिर्फ समस्त विशव का नक्शा बदला अपितु  मेरे प्रति लोगो का नज़रिया भी बदला। कभी शापित माने जाने वाला कोयला, मनुष्य की सबसे बड़ी  जरुरत बन गया।जैसे जैसे विज्ञानं ने तरक्की , नए संसाधनों का अविष्कार हुआ और मेरे ऊपर मनुष्य की निर्भरता बदती गयी और उसका लालच भी। उर्जा की लालसा ने उसे इतना अँधा बना दिया की व् मेरे श्रापित रूप को देख ही नहीं पाए । अपनी माँ , धरती के गर्भ को चीर  के व दिन रात उसे खोखला बनाने लगे।
आज में अपने ही जनमदाता , जंगल  का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया हूँ। मेरी खोज में दिन रात सदियों  पुराने जंगल लगातार काटे  जा रहे है। इन्ही जंगलो की बदोलत मेरी उतपत्ति उत्पति हुई थी , इनमे  रह रहे जीव  मेरे मित्र  है, इनमे बहता शुद्ध जल मेरे लिए वरदान है। ,
मानता हूँ विकास के लिए मेरा खनन जरुरी है, किन्तो अपने जंगलो का विनाश मुझे मंज़ूर नहीं है। जानता हो मैं कई घरो में उजाले का प्रतीक हूँ किन्तो मेरी कालिख ने कई घरो के चिरागों को बुझाया भी है। उन्नत्ति का चिन्ह बनना को उचित है पर अपनी ही माँ का हतियारा बनना ठीक  है। 
मेरे कई मित्र है जो धरती को इस विनाश से बचा सकते है। अपने तेज से सूर्य आने वाले कई वर्षो तक मनुष्य की उर्जा जरोरतो को पूरा कर सकता है।**
अपनी अपार  शक्ति से वायु आने वर्षो तक हमें  निरंतर असीमित उर्जा प्रदान कर सकती है।  और ये मुमकिन है, ये हम जानते है, हमारे विज्ञानिक कहते है, हमारी धरती माँ चाहती है,  आवश्यकता है तो इन्हें पहेचानने की, इन्हें अपनाने की, कोयले का दुष्परिणाम भुगत हमारे साथियों की आवाज सुनने की, आवश्यकता है अपने पर्यावरण को बचाने की।
आज के इस बदलते युग में क्यूँ ना  उर्जा के प्रति हम अपनी सोच बदले, क्यूँ  ना हम अपनी सरकार से स्वछ उर्जा की मांग करे, क्यूँ ना हम उर्जा उद्योग के मल्लिको से अक्षय उर्जा में निवेश करने को कहे, क्यूँ न हम खुल के मेरा, यानि कोयले का बाहिष्कार करे।

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